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तेरे प्यार में घुट घुट के जी रहा हूँ मै

तेरे प्यार में घुट घुट के जी रहा हूँ मै|
जाने ये मौत क्यों न आती है||
प्यार के तीन शब्द कह न सका तुझसे मै|
ऎसी मर्दांगी पे शर्म आती है||

तुमसे कहेने की बहुत कोशिश करता रहा हूँ मै|
पर अंजाम देने से मेरी रूह डर जाती है||
तुम्हे खो न दूँ इस डर से मै|
न जाने मेरे बढ़ते कदम पीछे खीचें चली आती है||

अय हसीन दिन में तेरे हुस्न को देख दूर मचलता हूँ मै|
और रात में तेरे खयालो से नींद न आती है||
जाने कब तक तेरे प्यार में यूँ तडपता रहूँगा मै|
तुझसे कहने को ये कमबखत साहस भी न आती है||

तेरे प्यार में घुट घुट के जी रहा हूँ मै |
जाने ये मौत क्यों न आती है||
प्यार के तीन शब्द कह न सका तुझसे मै|
ऎसी मर्दांगी पे शर्म आती है||

Published inकविता

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